किडनी की तरह ही पित्ताशय की थैली यानी पित्त में भी पथरी बनती है, जो कि एक आम समस्या है। बता दें कि पित्त की पथरी का पता भी अचानक चलता है, जब इसका दर्द उठता है। वैसे तो पित्त की पथरी छोटी और कठोर होती है, लेकिन जब ये बनती है, तो पित्ताशय में कोलेस्ट्रॉल और बाइल साल्ट की मात्रा बढ़ने लगता है। वैसे ये दर्दनाक बीमारी है। ऐसे में जरूरी है कि इसे वक्त रहते दूर कर लिया जाए। लेकिन पित्त पथरी की आयुर्वेदिक दवा क्या है।
पित्त में पथरी के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इसके मुख्य कारण कुछ इस प्रकार हैं -
पित्त पथरी के कारण और लक्षण जानने के बाद, आइए अब इसके उपायों के बारे में जानते हैं -
1) गिलोय - गिलोय का इस्तेमाल बहुत-सी आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में किया जाता है। इसके लिए आप गिलोय का काढ़ा भी पी सकते हैं। इससे आपको पित्त की पथरी में बहुत आराम मिलेगा।
2) हल्दी - हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-ऑक्सिडेंट गुण होते हैं। इनका सेवन करने से पित्त की घुलनशीलता को बढ़ाने में मदद मिलती है। हल्दी में शहद मिलाकर खाने से पित्त की पथरी की समस्या को दूर किया जा सकता है।
3) क्रैनबेरी का जूस - बक्रैनबेरी के जूस का सेवन करने से न सिर्फ आप हेल्दी रहते हैं, बल्कि पित्त की पथरी को निकालने में भी मदद मिलती है। क्रैनबेरी के जूस में फाइबर मौजूद होता है, जो शरीर के कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करता है और पित्त की पथरी को बनने से रोकता है।
4) सिंहपर्णी की जड़ - सिंहपर्णी एक ऐसा पौधा माना जाता है, जो पित्ताशय की पथरी को रोक सकता है। बता दें कि सिंहपर्णी की पत्तियां पित्त के उत्सर्जन में मदद करती है। आप चाहें तो इस जड़ी-बूटी की चाय बनाकर भी पी सकते हैं।
5) नारियल पानी - नारियल पानी में पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो पित्ताशय की पथरी को दूर करने में मदद करते हैं। नारियल पानी पेट को साफ करने का काम करता है। इसके साथ ही सारे टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करते हैं।
तो जैसा कि आपने जाना कि पित्त पथरी की आयुर्वेदिक दवा क्या है? ऐसे में अगर आपको भी इस समस्या से निजात चाहिए, तो इन उपायों को जरूर आजमाएं, लेकिन इन्हें अपनाने से पहले एक बार अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें, क्योंकि डॉक्टर आपकी रिपोर्ट्स देखकर बेहतर तरीके से बता पाएंगे कि आपके लिए ये उपाय कितने कारगर साबित होंगे।
पित्त पथरी (Gallbladder Stone) एक ऐसी स्थिति है जिसमें पित्ताशय (Gallbladder) में पथरी बन जाती है। इसके कारण पेट के दाहिने हिस्से में दर्द, मतली, उल्टी, अपच, गैस और तैलीय भोजन के बाद परेशानी हो सकती है। आयुर्वेद में पित्त पथरी का उपचार रोगी की प्रकृति, पथरी के आकार, लक्षणों की गंभीरता तथा संपूर्ण स्वास्थ्य का आकलन करने के बाद व्यक्तिगत रूप से तय किया जाता है।
रोगी की स्थिति के अनुसार कर्मा आयुर्वेदा में आयुर्वेदिक चिकित्सक आहार, विहार, औषधियों और पंचकर्म जैसी पारंपरिक आयुर्वेदिक पद्धतियों का संयोजन सुझा सकते हैं। सभी उपचार प्रत्येक मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होते और उनका चयन चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।
पित्त पथरी के मरीजों के लिए ऐसा भोजन उपयोगी माना जाता है जो हल्का, ताज़ा और आसानी से पचने वाला हो। हरी सब्जियां, मौसमी फल (चिकित्सकीय सलाह के अनुसार), साबुत अनाज, दालें और फाइबर युक्त भोजन को दैनिक आहार में शामिल किया जा सकता है।
अत्यधिक तला-भुना भोजन, अधिक तेल-मसाले वाला खाना, फास्ट फूड, पैकेज्ड फूड, अधिक घी, मक्खन और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखने की सलाह दी जाती है। लंबे समय तक भूखे रहने से बचना और समय पर भोजन करना भी लाभदायक माना जाता है।
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना और स्वस्थ वजन बनाए रखना पित्ताशय के सामान्य कार्य को समर्थन देने में मदद कर सकता है।
यदि मरीज को डायबिटीज, फैटी लिवर, मोटापा या किडनी की बीमारी है, तो उसकी डाइट उसी के अनुसार संशोधित की जाती है।
आयुर्वेद में नियमित जीवनशैली को उपचार का महत्वपूर्ण भाग माना गया है। समय पर सोना, पर्याप्त नींद लेना और तनाव को कम करना संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है।
आयुर्वेदिक जीवनशैली के अंतर्गत चिकित्सक की सलाह के अनुसार भुजंगासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन, अनुलोम-विलोम और गहरी श्वास संबंधी अभ्यास किए जा सकते हैं। इनका उद्देश्य समग्र स्वास्थ्य और पाचन क्रिया को सहयोग देना होता है।
रोज़ाना हल्की वॉक, चिकित्सक द्वारा सुझाए गए योगासन और प्राणायाम पाचन क्रिया को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। लंबे समय तक बैठे रहने की बजाय नियमित रूप से हल्की फिजिकल एक्टिविटी करने की सलाह दी जाती है।
वजन को नियंत्रित रखना, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाना तथा बहुत तेज़ी से वजन कम करने से बचना भी उपचार योजना का हिस्सा हो सकता है।
आयुर्वेद में शमन चिकित्सा का उद्देश्य दोषों का संतुलन बनाए रखना तथा पाचन और यकृत-पित्ताशय के कार्य को सहयोग देना होता है। औषधियों का चयन रोगी की स्थिति, लक्षणों और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के अनुसार किया जाता है।
कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां जिनका उपयोग चिकित्सकीय सलाह के अनुसार किया जा सकता है, उनमें भूम्यामलकी, कालमेघ, पुनर्नवा, कुटकी, त्रिफला, गिलोय, हल्दी, गुडूची, दारुहरिद्रा तथा वरुण शामिल हैं। इनका उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक योगों में किया जाता है।
कौन-सी औषधि किस मरीज के लिए उपयुक्त होगी, यह केवल योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक ही तय करते हैं। बिना सलाह के किसी भी आयुर्वेदिक दवा का सेवन नहीं करना चाहिए।
पित्त पथरी के सभी मरीजों को एक जैसी पंचकर्म थेरेपी नहीं दी जाती। उपचार का चयन पथरी के आकार, लक्षणों की गंभीरता, पित्ताशय में सूजन, रोगी की आयु तथा अन्य बीमारियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
अभ्यंग (Abhyang)
औषधीय तेलों से पूरे शरीर की मालिश की जाती है। इसका उद्देश्य शरीर को आराम देना तथा रक्त संचार को सहयोग देना होता है।
स्वेदन (Swedan)
औषधीय भाप या गर्म सेक द्वारा स्वेदन किया जाता है। इससे शरीर की जकड़न कम करने और आराम देने का प्रयास किया जाता है।
विरेचन (Virechana)
आयुर्वेद में विरेचन को पित्त दोष से संबंधित स्थितियों में महत्वपूर्ण शोधन प्रक्रिया माना जाता है। इसका उपयोग केवल योग्य चिकित्सक की देखरेख में और रोगी की स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद किया जाता है।
बस्ती (Basti)
यदि रोगी की प्रकृति और चिकित्सकीय आवश्यकता हो, तो आयुर्वेदिक चिकित्सक उपचार योजना में बस्ती को शामिल कर सकते हैं। इसका चयन केवल व्यक्तिगत मूल्यांकन के बाद किया जाता है।
शिरोधारा (Shirodhara)
यदि मरीज तनाव, चिंता या नींद की समस्या से भी परेशान है, तो चिकित्सक की सलाह के अनुसार शिरोधारा जैसी आयुर्वेदिक थेरेपी उपचार योजना का हिस्सा हो सकती है।
यदि पित्त पथरी का पता चल चुका है, तो समय-समय पर अल्ट्रासाउंड और चिकित्सकीय जांच कराना आवश्यक होता है। यदि मरीज को तेज़ पेट दर्द, बुखार, लगातार उल्टी, पीलिया या संक्रमण के लक्षण हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। यदि किसी मरीज में सर्जरी की आवश्यकता हो, तो उसका निर्णय संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर ही लेते हैं। आयुर्वेदिक उपचार का उपयोग हमेशा योग्य चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
Note: पित्त पथरी की आयुर्वेदिक दवा और उपचार प्रत्येक मरीज के लिए अलग होते हैं। पंचकर्म, औषधियां, आहार और जीवनशैली का चयन पथरी के आकार, लक्षणों की गंभीरता, आयु, अन्य बीमारियों और संपूर्ण चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है। किसी भी आयुर्वेदिक दवा, पंचकर्म या घरेलू उपाय को स्वयं शुरू करने के बजाय योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लेना आवश्यक है।
अगर आपको भी पित्त पथरी की समस्या महसूस हो रही है, तो आप अपना इलाज कर्मा आयुर्वेदा में आकर करवा सकते हैं। यहां पर सन् 1937 से किडनी रोगियों का आयुर्वेदिक इलाज किया जा रहा है और हाल ही में इसे डॉ. पुनीत धवन संभाल रहे हैं। डॉ. पुनीत न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में किडनी की बीमारी से जूझ रहे रोगियों का इलाज कर रहे हैं, क्योंकि आयुर्वेद में प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। कर्मा आयुर्वेदा किडनी डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट के बिना ही भारतीय आयुर्वेद के सहारे किडनी फेलियर का इलाज कर रहा है।
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