कुछ लोगों को बैठते-उठते समय, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए या गर्दन घुमाते वक़्त जोड़ो से “क्लिक-क्लिक”, “कट-कट” या “चरमराहट” जैसी आवाज़े महसूस होती हैं जो अक्सर बिना दर्द के होती हैं, कभी-कभी ईन आवाजों के साथ जकड़न, सूजन या दर्द भी महसूस होता है। ऐसे में दिमाग में सवाल उठता है कि जोड़ों में क्लिकिंग या आवाज़ आना – खतरा है या सामान्य? जिसके बारे में विस्तार से जानना बहुत ज़रूरी है। साथ ही जोड़ों की समस्या में दिखाई देने वाले दूसरे लक्षणों और आम जानकारी का पता होना चाहिए जिसकी जानकारी नीचे दी गई है।
आयुर्वेद में जोड़ो को संधि कहते हैं। संधि बॉडी की वह संरचना है जहाँ दो हड्डियाँ मिलती हैं और गति संभव होती है। संधियों का पोषण ख़ासकर श्लेषक कफ करता है, जो जोड़ो को चिकनाई, मजबूती और लचीलापन देता है। जब श्लेषक कफ संतुलित रहता है, तब जोड़ ठीक से काम करते हैं लेकिन, जब किसी कारण से कफ कमज़ोर हो जाए या सूखने लगे, तब जोड़ो में घर्षण बढ़ता है और आवाज़ आने लगती है।
आयुर्वेद की नज़र में जोड़ो में क्लिकिंग या आवाज़ आने का ख़ास कारण है वात दोष का प्रकोप। वात दोष का गुण है – ड्रायनेस, हल्कापन और गतिशीलता। जब बॉडी में वात बढ़ता है, तो वह संधियों में मौजूद श्लेषक कफ को शोषित करने लगता है। इससे जोड़ सूखे लगने लगते हैं, हड्डियों के बीच घर्षण बढ़ता है और चलने-फिरने पर आवाज़ पैदा होती है। यह कन्डिशन आयुर्वेद में संधिगत वात की शुरुआती अवस्था मानी जाती है।
आयुर्वेद के हिसाब से हर कन्डिशन में जोड़ो से आवाज़ आना रोग नहीं होता अगर आवाज़ कभी-कभी ही आती हो, दर्द, सूजन या अकड़न नहीं हो, उम्र कम हो और ऐक्टिव लाइफस्टाइल हो। लेकिन, अगर आवाज़ के साथ-साथ सुबह उठते ही जकड़न हो, चलने पर ज़्यादा दर्द हो, जोड़ों में सूजन हो और उम्र के साथ दिक्कतें बढ़ती जाए तो यह वात विकार का लक्षण हो सकता है, जिसे इग्नोर नहीं करना चाहिए।
अगर यह समस्या सचमुच वात विकार की वजह से है तो इसे इग्नोर करने पर नीचे दी गई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है –
आयुर्वेद के अनुसार जोड़ो की हेल्थ सीधे डाइट से जुड़ी होती है। वात दोष को बैलेन्स करने के लिए गर्म, ताज़ा और आसानी से पचने वाला खाना खाएँ। घी, तिल का तेल, दलिया, मूंग दाल, सब्ज़ियों का सूप, अदरक, अजवाइन, हींग आदि को अपनी डाइट में शामिल करें। साथ ही कुछ चीज़ों का परहेज़ करें जैसे – सूखा या बासी खाना, ठंडी चीज़ें और ज़्यादा कैफीन। यह वात को बढ़ा सकते हैं।
आयुर्वेद सिर्फ़ दवाओं पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सही रूटीन को ट्रीटमेंट का आधार मानता है। जोड़ों की समस्या में आयुर्वेद नीचे दिए गए टिप्स फॉलो करने का सुझाव देता है –
आयुर्वेदिक के हिसाब से अगर जोड़ो से आवाज़ के साथ-साथ लगातार दर्द, सूजन या चलने-फिरने में कठिनाई होती है तो यह बॉडी के गहरे असंतुलन का लक्षण हो सकता है। ऐसे में केवल घरेलू उपायों पर निर्भर न रहकर अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह तुरंत लें।
अगर इसके साथ दर्द, जकड़न या चक्कर न हों तो हल्का वात असंतुलन हो सकता है, लेकिन लगातार हो तो सावधानी ज़रूरी है।
हाँ, अनदेखी करने पर यह कन्डिशन आगे चलकर संधिगत वात या गठिया का रूप ले सकती है।
यह जोड़ों की चिकनाई कम होने और वात दोष के बढ़ने का लक्षण हो सकता है।
आयुर्वेद बॉडी के दोष संतुलन पर काम करता है, इसलिए सही डाइट, रूटीन और उपचार से समस्या की जड़ तक पहुँचा जा सकता है।
आज के इस ब्लॉग में हमनें आपको बताया कि जोड़ों में आवाज़ आना – खतरा है या सामान्य? लेकिन, आप सिर्फ़ इस जानकारी या सुझावों पर निर्भर ना रहें। अगर आप या आपके किसी साथी/रिश्तेदार को जोड़ों में क्लिकिंग या आवाज़ की समस्या है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें या कर्मा आयुर्वेदा अस्पताल में भारत के बेस्ट आयुर्वेदिक डॉक्टर से जोड़ों की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार लें। हेल्थ से जुड़े ऐसे और भी ब्लॉग्स और आर्टिकल्स के लिए जुड़े रहें कर्मा आयुर्वेदा के साथ।
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